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Tuesday, October 11, 2016

kavita

कविता

एक तस्वीर जो वर्षों पहले मैने
अपने कमरे की दीवार पे टांगी थी
सोच रहा हुं उसको आँखें दान करूँ
ताकि वो सब देख सके
कैसे ग़म के साए खिरकी से अन्दर आते हैं
कैसे दीवारों पर दूख उगते है
कैसे मैं
उसकी याद में हर लम्हा,अपने अनदर मरता रहती हूँ
कैसे सूबह से शाम तलक
मैं अपने बिखरे ख्वाबों की ताबीरें पढता रहता हूँ
कैसे उम्मीदों का एक दिया
इस कमरे के इक त़ाक पे अब भी रौशऩ है
कैसे इस कमरे में सूरज की किरणें आने से कतराती हैं
कैसे इस कमरे के अन्दर यादें बिखरी रहती हैं

मैं जो वर्षों पहले टूट चुका हूँ
कैसै इस कमरे में जिन्दा रहता हूँ

सोच रहा हुं उसको आँखें दान करूँ
ताकि वो सब देख सके

इन्आम आजमी

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